Indian Rupee Fall: डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपये में ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की जा रही है। आंकड़ा 94.8 तक पहुंच गया है जिसने 2013 के आर्थिक संकट की यादें ताजा कर दी हैं। एक तरफ देश के पास 700 अरब डॉलर से अधिक का मजबूत विदेशी मुद्रा भंडार है तो दूसरी तरफ रुपया महज 23 दिनों में 92 से 94.8 के स्तर पर लुढ़क गया है। इस उलझन को सुलझाते हुए SBI रिसर्च ने एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है। रिपोर्ट बताती है कि बाजार में डर असलियत से कहीं ज्यादा बड़ा है। तेल कंपनियों की भारी डॉलर मांग और बैंकिंग सिस्टम में नई अड़चनें इस गिरावट का मुख्य कारण हैं। जानिए कैसे RBI 'ऑपरेशन ट्विस्ट' और खास डॉलर विंडो के जरिए इस मुश्किल हालात को काबू में कर सकता है।
नई दिल्ली, 31 मार्चः वैश्विक बाजार में इन दिनों एक अजीब सी बेचैनी है। डॉलर लगातार अपनी ताकत दिखा रहा है और भारतीय रुपया दबाव में दबकर नए निचले स्तर छू रहा है। कई लोगों के मन में यह सवाल उठ रहा है कि क्या हम वापस 2013 वाले खतरनाक मोड़ पर आकर खड़े हो गए हैं। तब भी करेंसी मार्केट में भारी हाहाकार मचा था। लेकिन इस बार तस्वीर के पीछे की कहानी बिल्कुल अलग है।
SBI रिसर्च की हालिया रिपोर्ट ने इस पूरे मामले पर एक नई रोशनी डाली है। बाजार में डर का माहौल जरूर है। लोग घबरा रहे हैं। पर इस रिपोर्ट के मुताबिक हमारी आर्थिक बुनियाद पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और सुरक्षित है।
700 अरब डॉलर का सुरक्षा कवच और रुपये की विडंबना
भारत इस समय कोई कमजोर स्थिति में नहीं है। हमारे पास 700 अरब डॉलर से भी ज्यादा का विशाल विदेशी मुद्रा भंडार मौजूद है। यह रकम इतनी बड़ी है कि अगर देश को अगले 10 महीने तक लगातार सिर्फ आयात करना पड़े तो भी कोई परेशानी नहीं आएगी। हमारा शॉर्ट टर्म कर्ज भी काफी सीमित और नियंत्रण में है। कागज पर और आंकड़ों में सब कुछ एकदम ठोस दिखता है।
फिर सवाल यह उठता है कि रुपया रोज क्यों फिसल रहा है।
रिपोर्ट साफ करती है कि यह कमजोरी उतनी भयानक नहीं है जितनी स्क्रीन पर लाल रंग में दिखाई दे रही है। बाजार में अनिश्चितता का एक दौर चल रहा है। अचानक से डॉलर की मांग बहुत ज्यादा बढ़ गई है जिससे रुपये पर भारी दबाव बन गया है। ऐसे वक्त में RBI के पास पूरी ताकत और मौका है कि वह बाजार में सीधा दखल दे और इस गिरावट को थाम ले।
गिरावट की रफ्तार ने उड़ाए सबके होश
अगर आप रुपये के गिरने की रफ्तार को देखेंगे तो असली हैरानी वहां होती है। एक समय था जब रुपये को 5 रुपये तक कमजोर होने में सालों लग जाते थे। अब कुछ ही दिनों में बड़े झटके लग रहे हैं।
नीचे दिए गए आंकड़े बताते हैं कि रुपया कितनी तेजी से नीचे आया है:
| डॉलर रेंज (रुपये में) | समय (दिनों में) |
| 65 से 70 | 1815 |
| 70 से 75 | 581 |
| 75 से 80 | 917 |
| 80 से 85 | 819 |
| 85 से 90 | 349 |
| 90 से 91 | 13 |
| 91 से 92 | 78 |
| 92 से 94.8 | 23 |
सोचने वाली बात है कि 65 से 70 तक पहुंचने में जहां 1815 दिन लगे थे वहीं 92 से 94.8 तक गिरने में केवल 23 दिन लगे। यह तेज रफ्तार ही बाजार में पैनिक का सबसे बड़ा कारण है।
तेल कंपनियों का भारी दबाव
इस गिरावट के पीछे एक बड़ा हाथ तेल कंपनियों का भी है। भारत अपनी जरूरत का ज्यादातर कच्चा तेल बाहर से खरीदता है। तेल कंपनियों को इसके लिए हर दिन बाजार से भारी मात्रा में डॉलर खरीदने पड़ते हैं। जब वे एक साथ इतना डॉलर मांगती हैं तो बाजार में रुपये की सप्लाई बढ़ जाती है और डॉलर कम पड़ने लगता है। इससे रुपया स्वाभाविक रूप से कमजोर होने लगता है।
SBI रिपोर्ट में इसका एक बहुत ही शानदार और व्यावहारिक सुझाव दिया गया है। रिपोर्ट कहती है कि इन तेल कंपनियों के लिए एक अलग डॉलर विंडो बना देनी चाहिए। अगर तेल कंपनियां बाजार से डॉलर खरीदने के बजाय सीधे एक तय रास्ते से डॉलर लेंगी तो आम बाजार में अचानक पड़ने वाला दबाव खत्म हो जाएगा। असली मांग और सप्लाई की सही तस्वीर सामने आएगी।
बैंकिंग सिस्टम में एक नई उलझन
मामला सिर्फ डॉलर की मांग तक सीमित नहीं है। बैंकिंग सिस्टम के अंदर भी कुछ अड़चनें आ रही हैं। RBI ने हाल ही में कुछ नए नियम लागू किए हैं। इन नियमों के कारण ऑनशोर बाजार और ऑफशोर बाजार के बीच का फासला बहुत ज्यादा बढ़ गया है।
इसका सीधा असर यह हो रहा है कि डॉलर आसानी से उपलब्ध नहीं हो पा रहा है। विदेशी बाजार में प्रीमियम बहुत तेजी से ऊपर जा रहा है। बैंक अपनी खुद की पोजिशन संभालने और बैलेंस शीट को ठीक रखने में उलझे हुए हैं। रिपोर्ट साफ चेतावनी देती है कि अगर इस ऑनशोर और ऑफशोर के अंतर को जल्दी ठीक नहीं किया गया तो यह भविष्य में एक नया और बड़ा संकट खड़ा कर सकता है।
दुनिया की बाकी करेंसी और रुपये का हाल
एक बहुत ही दिलचस्प और चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जब पूरी दुनिया में बाकी देशों की करेंसी डॉलर के सामने मजबूत हो रही थीं तब भी हमारा रुपया कमजोर ही हो रहा था।
नीचे दिए गए आंकड़ों पर गौर करें कि 2025 से 2026 के बीच अन्य करेंसी ने कैसा प्रदर्शन किया:
| करेंसी (USD के मुकाबले) | प्रतिशत बदलाव (02.04.2025 से 27.02.2026) | प्रतिशत बदलाव (27.02.2026 के बाद) |
| डॉलर इंडेक्स | -6.0 | 2.7 |
| यूरो | 8.8 | -2.7 |
| ब्राज़ीलियन रियल | 9.4 | -2.2 |
| ब्रिटिश पाउंड | 3.9 | -1.8 |
| चीनी युआन | 5.6 | -0.7 |
| भारतीय रुपया | -6.4 | -4.2 |
| साउथ अफ्रीकन रैंड | 15.4 | -7.6 |
| रूसी रूबल | 8.7 | -5.1 |
| जापानी येन | -3.9 | -2.2 |
इन आंकड़ों से एक बात बिल्कुल साफ हो जाती है। जब डॉलर इंडेक्स 6.0 प्रतिशत गिरा था तब यूरो और पाउंड जैसी करेंसी ऊपर गई थीं। लेकिन भारतीय रुपया तब भी 6.4 प्रतिशत नीचे गया था। इसका मतलब है कि रुपये को हर तरह के दबाव को सहने वाला शॉक एब्जॉर्बर बना देना एक सही नीति नहीं है। एक हद के बाद यह रणनीति देश की अर्थव्यवस्था पर भारी पड़ सकती है।
RBI को अपनाना होगा आक्रामक रुख और Operation Twist
अब हाथ पर हाथ धरे बैठे रहने का समय निकल चुका है। रिपोर्ट स्पष्ट रूप से इशारा करती है कि RBI को अब फ्रंट फुट पर आकर खेलना होगा। केवल बाजार के भरोसे चीजों को छोड़ना नुकसानदायक हो सकता है। हमारे पास जो 700 अरब डॉलर का विशाल भंडार है उसका सही समय पर इस्तेमाल होना चाहिए। जरूरत पड़ने पर विदेशी मुद्रा बाजार में सीधा दखल देकर रुपये को गिरने से रोकना होगा।
सिस्टम में नकदी या लिक्विडिटी का संतुलन बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है। अगर अचानक से बाजार में पैसों की कमी हो गई तो हालात बेकाबू हो सकते हैं।
यहीं पर नाम आता है ऑपरेशन ट्विस्ट का। यह रिजर्व बैंक का एक बहुत ही कारगर हथियार है।
- क्या है Operation Twist: यह एक ऐसा तरीका है जिसमें RBI छोटी अवधि वाले और लंबी अवधि वाले बॉन्ड्स के साथ एक साथ काम करता है। RBI बाजार में अपने छोटी अवधि वाले बॉन्ड बेचता है और उसी समय लंबी अवधि वाले बॉन्ड खरीद लेता है।
- कैसे करता है काम: जब RBI छोटी अवधि के बॉन्ड बेचता है तो उनकी सप्लाई बढ़ती है और छोटी अवधि की ब्याज दरें ऊपर चली जाती हैं। दूसरी तरफ जब वह लंबी अवधि के बॉन्ड खरीदता है तो लंबी अवधि की ब्याज दरें नीचे आती हैं या स्थिर हो जाती हैं।
- आम आदमी को फायदा: जो लोग लंबे समय के लिए लोन लेते हैं जैसे होम लोन या बिजनेस लोन उनके लिए कर्ज की दरें ज्यादा महंगी नहीं होतीं। बाजार में पैसे का संतुलन बना रहता है। इससे अर्थव्यवस्था की रफ्तार धीमी नहीं पड़ती और साथ ही रुपये को भी एक मजबूत सहारा मिल जाता है।
पुरानी गलतियों से सीखने का वक्त
हमें इतिहास से सीखना चाहिए पर उसे दोहराना नहीं चाहिए। 2008 की मंदी और 2013 के संकट के समय RBI ने कई बड़े और कड़े फैसले लिए थे। उस समय ब्याज दरों में अचानक बदलाव किया गया था और डॉलर स्वैप जैसी खास स्कीमें लाई गई थीं। उन पुराने कदमों से उस समय के हालात जरूर संभल गए थे।
लेकिन SBI की यह रिसर्च रिपोर्ट एक बहुत पते की बात कहती है। आज के हालात बिल्कुल अलग हैं। दुनिया की सप्लाई चेन से लेकर जियोपॉलिटिकल स्थितियां तक सब बदल चुका है। इसलिए 2013 वाले समाधानों को आज जस का तस कॉपी पेस्ट करना समझदारी नहीं होगी। आज की चुनौती नई है तो इलाज भी नया और आधुनिक होना चाहिए।
अगर रुपये की अस्थिरता ऐसे ही बनी रही तो आयात महंगा हो जाएगा। बाहर से आने वाला सामान और कच्चा तेल महंगा होने से देश के अंदर महंगाई दर तेजी से बढ़ सकती है जिसका सीधा असर आम जनता की जेब पर पड़ेगा।
भारत की आर्थिक बुनियाद आज भी मजबूत है। सरकार और रिजर्व बैंक दोनों को मिलकर बस इस तात्कालिक घबराहट को शांत करना है। सही नीतियां और समय पर उठाए गए कदम इस तूफान को आसानी से पार लगा सकते हैं। विदेशी मुद्रा भंडार का सही इस्तेमाल ही इस समय सबसे बड़ी चाबी है।

