FPI Selling India: भारतीय शेयर बाजार से FPI ने अप्रैल के पहले 10 दिनों में 48,213 करोड़ रुपये निकाल लिए हैं। साल 2026 में अब तक 1.8 लाख करोड़ की बिकवाली हो चुकी है। जानिए इस गिरावट की असली वजह।
नई दिल्ली, 12 अप्रैलः भारतीय शेयर बाजार में इन दिनों हलचल तेज है। पिछले कुछ समय से बाजार में जो उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की लगातार हो रही बिकवाली है। अप्रैल महीने की शुरुआत भारतीय शेयर बाजार के लिए अच्छी नहीं रही है। आंकड़ों पर नजर डालें तो विदेशी निवेशकों ने अप्रैल के पहले 10 दिनों के भीतर ही बाजार से 48,213 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि निकाल ली है। यह बिकवाली न केवल निवेशकों को डरा रही है, बल्कि बाजार के जानकारों के लिए भी चिंता का विषय बनी हुई है।
आंकड़ों की जुबानी: 2026 में अब तक का हाल
नेशनल सिक्योरिटीज डिपॉजिटरी लिमिटेड (NSDL) की ओर से जारी ताजा आंकड़ों ने सबको चौंका दिया है। वर्ष 2026 में भारतीय शेयर बाजार ने विदेशी निवेशकों का एक अलग ही रूप देखा है। इस साल अब तक कुल बिकवाली का आंकड़ा 1.8 लाख करोड़ रुपये को पार कर चुका है।
अगर हम पिछले कुछ महीनों का विश्लेषण करें, तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है:
- अप्रैल (पहले 10 दिन): 48,213 करोड़ रुपये की शुद्ध बिकवाली।
- मार्च: इस महीने में FPI ने रिकॉर्ड 1.17 लाख करोड़ रुपये के शेयर बेचे थे।
- फरवरी: यह महीना थोड़ा राहत भरा रहा था, जहां निवेशकों ने 22,615 करोड़ रुपये का निवेश किया, जो पिछले 17 महीनों का सबसे उच्चतम स्तर था।
लेकिन फरवरी की वह बढ़त मार्च और अप्रैल की बिकवाली के आगे अब छोटी नजर आ रही है।
क्यों भाग रहे हैं विदेशी निवेशक?
एनालिस्ट्स और बाजार विशेषज्ञों का मानना है कि यह बिकवाली अचानक नहीं हुई है, बल्कि इसके पीछे कई गहरे वैश्विक और आर्थिक कारण छिपे हैं।
- 1. भू-राजनीतिक तनाव
मॉर्निंगस्टार इनवेस्टमेंट रिसर्च इंडिया के प्रिंसिपल-मैनेजर रिसर्च, हिमांशु श्रीवास्तव के अनुसार, पश्चिम एशिया (Middle East) में बढ़ता तनाव सबसे बड़ा कारण है। जब भी दुनिया के किसी हिस्से में युद्ध जैसी स्थिति बनती है, विदेशी निवेशक उभरते बाजारों (Emerging Markets) से अपना पैसा निकालकर सुरक्षित ठिकानों पर ले जाते हैं।
- 2. कच्चे तेल की कीमतों में उछाल:
पश्चिम एशिया संकट का सीधा असर कच्चे तेल की सप्लाई पर पड़ा है। तेल की कीमतें बढ़ने से वैश्विक स्तर पर महंगाई बढ़ने का डर सता रहा है। भारत जैसा देश, जो अपनी जरूरत का अधिकांश तेल आयात करता है, उसके लिए कच्चा तेल महंगा होना उसकी अर्थव्यवस्था और मुद्रा (रुपये) के लिए हानिकारक साबित होता है।
- 3. रुपये की कमजोरी:
जियोजीत इनवेस्टमेंट्स के चीफ इनवेस्टमेंट स्ट्रैटेजिस्ट वीके विजयकुमार का कहना है कि रुपये में आई कमजोरी ने विदेशी निवेशकों के भरोसे को कम किया है। जब डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर होता है, तो विदेशी निवेशकों का रिटर्न कम हो जाता है, जिससे वे बिकवाली करना बेहतर समझते हैं।
- 4. अन्य बाजारों का आकर्षण:
वर्तमान में दक्षिण कोरिया और ताइवान जैसे देशों के बाजार विदेशी निवेशकों को भारत की तुलना में अधिक आकर्षित कर रहे हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि उन बाजारों में ‘यील्ड' (Yield) यानी मुनाफे की संभावनाएं भारत के मुकाबले फिलहाल बेहतर नजर आ रही हैं। भारत का बाजार इस समय थोड़ा महंगा (Overvalued) माना जा रहा है, जिसकी वजह से निवेशक अब सस्ते विकल्पों की तलाश में हैं।क्या आगे भी जारी रहेगी यह बिकवाली?
बाजार के जानकारों का मानना है कि FPI का अगला कदम 3 मुख्य कारकों पर निर्भर करेगा:
- होर्मुज स्ट्रैट (Hormuz Strait): यह समुद्री मार्ग वैश्विक तेल व्यापार के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है। यदि यह मार्ग सामान्य रूप से खुला रहता है और तनाव कम होता है, तो बाजार में स्थिरता लौट सकती है।
- रुपये की स्थिति: अगर भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) रुपये को स्थिर रखने में कामयाब होता है, तो विदेशी निवेशकों की वापसी हो सकती है।
- चौथी तिमाही (Q4) के नतीजे: भारतीय कंपनियों के वित्तीय नतीजे अगर उम्मीद से बेहतर आते हैं, तो यह निवेशकों को दोबारा खरीदारी के लिए प्रोत्साहित करेगा।
एक छोटी सी राहत की किरण
हालांकि अप्रैल के आंकड़े डराने वाले हैं, लेकिन बीते शुक्रवार को एक सकारात्मक संकेत भी देखने को मिला। शुक्रवार को विदेशी संस्थागत निवेशक (FII) 'नेट बायर' रहे और उन्होंने भारतीय बाजार में 672 करोड़ रुपये का निवेश किया। यह छोटी सी शुरुआत इस बात का संकेत हो सकती है कि अगर परिस्थितियां सुधरती हैं, तो विदेशी निवेशक वापस लौटने में देर नहीं करेंगे।
भारतीय शेयर बाजार इस समय एक चुनौतीपूर्ण दौर से गुजर रहा है। विदेशी निवेशकों की बिकवाली ने निश्चित रूप से दबाव बनाया है, लेकिन भारतीय घरेलू निवेशक (DII) और रिटेल निवेशक इस दबाव को झेलने की कोशिश कर रहे हैं। आने वाले कुछ हफ्ते भारतीय बाजार की दिशा तय करने में बहुत महत्वपूर्ण होंगे। निवेशकों को सलाह दी जाती है कि वे जल्दबाजी में कोई फैसला न लें और वैश्विक घटनाक्रमों पर पैनी नजर रखें।
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