Gold in ocean: जर्मनी के GEOMAR सेंटर के वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में एक ऐसी जगह खोजी है, जिसे 'पृथ्वी की सोने की रसोई' (Earth's Gold Kitchen) कहा जा रहा है। न्यूजीलैंड के पास केर्माडेक आर्क में हुई इस रिसर्च से पता चला है कि सोना किसी एक प्रक्रिया से नहीं, बल्कि धरती के मेंटल के बार-बार पिघलने से बनता है। यह खोज बताती है कि कैसे ज्वालामुखी, टेक्टोनिक प्लेटों का टकराव और अत्यधिक तापमान मिलकर पाताल में सोने के विशाल भंडार का निर्माण करते हैं। यह आर्टिकल इस पूरी प्रक्रिया को सरल भाषा में समझाता है और यह भी बताता है कि क्या भविष्य में समुद्र से सोना निकालना संभव हो पाएगा। यह खोज भूविज्ञान की दुनिया में एक मील का पत्थर साबित हो सकती है, जो हमें कीमती धातुओं के बनने की पूरी कहानी बताती है।
नई दिल्ली, 10 अप्रैलः बचपन में हमने दादी-नानी की कहानियों में पारस पत्थर के बारे में सुना था, जो लोहे को सोना बना देता था। लेकिन क्या आपने कभी ऐसी 'रसोई' या 'भट्टी' के बारे में सुना है, जहां सोना खुद-ब-खुद बनता हो? सुनने में यह किसी साइंस-फिक्शन फिल्म की कहानी लगती है, लेकिन वैज्ञानिकों ने हकीकत में एक ऐसी ही जगह खोज निकाली है। यह जगह कहीं और नहीं, बल्कि हमारे महासागरों की अथाह गहराइयों में छिपी है।
जर्मनी के GEOMAR हेल्महोल्त्ज़ सेंटर फॉर ओशन रिसर्च के वैज्ञानिकों की एक टीम ने समुद्र के सीने को चीरकर एक ऐसे रहस्य से पर्दा उठाया है, जिसने पूरी दुनिया को हैरान कर दिया है। उन्होंने उस प्रक्रिया को डिकोड कर लिया है जिससे धरती के गर्भ में सोना बनता है। इसे विज्ञान की भाषा में 'मेंटल अल्केमी' का नाम दिया गया है। आइए, इस रोमांचक खोज की गहराई में चलते हैं और जानते हैं कि आखिर समुद्र के नीचे यह 'सोने की भट्टी' कैसे काम करती है।
क्या है 'पृथ्वी की सोने की रसोई'?
वैज्ञानिकों ने समुद्र की गहराई में एक खास जगह को "पृथ्वी की सोने की रसोई" (Earth's 'gold kitchen') का नाम दिया है। यह वो जगह है जहां सोना 'पकता' यानी बनता है। यह जगहें आमतौर पर ज्वालामुखी द्वीपीय चाप (Volcanic Island Arcs) के नीचे पाई जाती हैं।
ज्वालामुखी द्वीपीय चाप क्या हैं?
ये ज्वालामुखियों की एक लंबी श्रृंखला होती है जो एक चाप (Arc) के आकार में होती है। इनका निर्माण तब होता है जब एक भारी समुद्री टेक्टोनिक प्लेट, दूसरी हल्की प्लेट के नीचे खिसक जाती है (जिसे सबडक्शन जोन कहते हैं)। इस प्रक्रिया में जबरदस्त गर्मी और दबाव पैदा होता है, जिससे ज्वालामुखी फटते हैं और द्वीपों की एक चेन बन जाती है, जैसे जापान और न्यूजीलैंड के आसपास के द्वीप।
लंबे समय से भूवैज्ञानिक यह जानते थे कि इन इलाकों में सोने की मात्रा बाकी जगहों से कहीं ज्यादा होती है, लेकिन इसके पीछे का सटीक कारण एक पहेली बना हुआ था। अब, नई रिसर्च ने इस पहेली को सुलझाने का दावा किया है।
वैज्ञानिकों की सबसे बड़ी खोज: केर्माडेक आर्क का राज
इस गुत्थी को सुलझाने का बीड़ा उठाया जर्मनी के कील स्थित GEOMAR के समुद्री भूवैज्ञानिक डॉ. क्रिश्चियन थिम्म और उनकी टीम ने। उन्होंने अपनी रिसर्च के लिए न्यूजीलैंड के उत्तर में स्थित केर्माडेक आइलैंड आर्क (Kermadec Island Arc) को चुना, जो अपनी तीव्र ज्वालामुखीय गतिविधियों के लिए जाना जाता है।
वैज्ञानिकों ने इस इलाके में समुद्र की तलहटी से ज्वालामुखी के कांच (Volcanic Glass) के 66 सैंपल इकट्ठे किए। ये कांच कोई साधारण कांच नहीं हैं, बल्कि ये एक तरह के 'टाइम कैप्सूल' हैं। जब ज्वालामुखी का खौलता हुआ लावा (लगभग 1200 डिग्री सेल्सियस) समुद्र के ठंडे पानी के संपर्क में आता है, तो वह इतनी तेजी से ठंडा होता है कि उसके अंदर के केमिकल जम जाते हैं। इससे हमें मैग्मा की उस असली रासायनिक संरचना का पता चलता है जो धरती की गहराइयों से निकली थी।
‘जादुई कांच' ने खोला सोने का सबसे बड़ा रहस्य
इन 66 सैंपल्स की जांच के दौरान वैज्ञानिकों को कुछ ऐसे 'पुराने कांच' मिले जो मैग्मा के शुरुआती रूप को दर्शाते थे। जब इन नमूनों का विश्लेषण किया गया, तो नतीजे चौंकाने वाले थे।
इन सैंपल्स में सोने की मात्रा (लगभग 6 नैनोग्राम प्रति ग्राम) समुद्र के अन्य हिस्सों की चट्टानों के मुकाबले कई गुना ज्यादा थी। यहां तांबे के मुकाबले सोने का अनुपात भी सामान्य समुद्री चट्टानों की तुलना में बहुत अधिक था। इसने वैज्ञानिकों के सामने एक बड़ा सवाल खड़ा कर दिया - आखिर इस जगह पर इतना सोना आ कहां से रहा है? यह खोज इस बात का साफ संकेत थी कि यह इलाका कुदरती तौर पर सोने के मामले में बेहद अमीर है।
सोना अकेला नहीं, अपने 'दोस्तों' के साथ आता है!
इस रहस्य को और गहराई से समझने के लिए टीम ने सिर्फ सोने पर ही ध्यान नहीं दिया। उन्होंने सोने के 'करीबी दोस्तों' यानी उन तत्वों की भी जांच की, जो पिघलते समय सोने जैसा ही व्यवहार करते हैं। इनमें चांदी, तांबा, सल्फर और प्लेटिनम जैसी धातुएं शामिल थीं। इन सभी तत्वों के अनुपात और मात्रा का विश्लेषण करके वैज्ञानिक यह समझने में कामयाब हुए कि धरती के मेंटल (Mantle - धरती की परत के नीचे का हिस्सा) में आखिर ऐसी कौन-सी प्रक्रिया चल रही है जो सोने को बाहर उगल रही है।
सोना बनने की पूरी प्रक्रिया: स्टेप-बाय-स्टेप समझें
रिसर्च से पता चला कि सोना बनने की प्रक्रिया किसी एक घटना का नतीजा नहीं, बल्कि कई चरणों वाली एक जटिल प्रक्रिया है।
- पानी की भूमिका: जब एक टेक्टोनिक प्लेट दूसरी के नीचे जाती है, तो अपने साथ भारी मात्रा में समुद्री पानी भी मेंटल में ले जाती है। यह पानी मेंटल के पिघलने के तापमान को कम कर देता है, जिससे चट्टानें पिघलना शुरू हो जाती हैं और मैग्मा बनता है।
- बार-बार पिघलने की प्रक्रिया: असली खेल यहीं से शुरू होता है। वैज्ञानिकों ने पाया कि मेंटल सिर्फ एक बार नहीं, बल्कि बार-बार उच्च तापमान पर पिघलता है। हर बार जब मेंटल पिघलता है, तो वह सोने को अपने अंदर से निकालकर मैग्मा में छोड़ देता है।
- सल्फाइड मिनरल्स का टूटना: मेंटल में सोना आमतौर पर सल्फाइड नामक खनिजों में फंसा रहता है। जब तापमान बहुत ज्यादा होता है और चट्टान बार-बार पिघलती है, तो ये सल्फाइड मिनरल्स टूट जाते हैं। इनके टूटते ही सारा सोना आजाद होकर पिघले हुए मैग्मा में मिल जाता है।
- सोने का जमा होना: यह प्रक्रिया जितनी बार दोहराई जाती है, मैग्मा में सोने की मात्रा उतनी ही बढ़ती जाती है। यानी, बार-बार पिघलने से सोना एक जगह इकट्ठा (Concentrate) होता जाता है। यही वजह है कि इन ज्वालामुखीय इलाकों से निकलने वाले मैग्मा में सोने की मात्रा इतनी ज्यादा होती है।
यह ठीक वैसा ही है जैसे आप बार-बार पानी उबालकर नमक इकट्ठा करते हैं। हर बार उबालने पर पानी उड़ जाता है और नमक की मात्रा बढ़ती जाती है। ठीक उसी तरह, मेंटल के बार-बार पिघलने से सोना मैग्मा में जमा होता जाता है।
तो क्या हम समुद्र से सोना निकाल सकते हैं?
यह सवाल आपके मन में जरूर आया होगा। अगर समुद्र के नीचे इतना सोना है, तो उसे निकाला क्यों नहीं जाता?
इसका जवाब है - आर्थिक व्यावहारिकता
वैज्ञानिकों के अनुसार, भूवैज्ञानिक नजरिए से 6 नैनोग्राम प्रति ग्राम सोना एक बड़ी मात्रा है, लेकिन खनन के नजरिए से यह बहुत कम है। आज के समय में सोने की खदानों में अयस्क से प्रति टन कुछ ग्राम सोना निकाला जाता है। समुद्र की इतनी गहराई से चट्टानों को निकालकर, उन्हें प्रोसेस करके नैनोग्राम स्तर पर सोना निकालना तकनीकी रूप से बेहद मुश्किल और आर्थिक रूप से घाटे का सौदा होगा। इस पर आने वाला खर्च, उससे निकलने वाले सोने की कीमत से हजारों गुना ज्यादा होगा।
इसलिए, भले ही समुद्र में 'सोने की रसोई' मौजूद है, लेकिन फिलहाल हम वहां से सोना निकालकर उसका इस्तेमाल नहीं कर सकते।
इस खोज का असली महत्व क्या है?
भले ही हम इस सोने का खनन नहीं कर सकते, लेकिन यह खोज भूविज्ञान और मानव जाति के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
- धरती को समझने में मदद: यह रिसर्च हमें बताती है कि हमारी पृथ्वी कैसे काम करती है और कीमती धातुओं का निर्माण कैसे होता है।
- सोने की पूरी लाइफ साइकिल: डॉ. थिम्म के अनुसार, वे असल में "सोने की जीवन-यात्रा" (Life Cycle of Gold) की शुरुआत को देख रहे हैं। यह खोज बताती है कि सतह पर मिलने वाली सोने की खदानों की कहानी असल में धरती के गर्भ में लाखों साल पहले ही शुरू हो जाती है।
- नए भंडारों की खोज: इस समझ का उपयोग करके भविष्य में वैज्ञानिक जमीन पर सोने और अन्य कीमती धातुओं के नए भंडारों का पता लगा सकते हैं।
- हाइड्रोथर्मल भंडारों का रहस्य: यह खोज यह भी समझाती है कि समुद्र के नीचे ज्वालामुखीय इलाकों में मिलने वाले हाइड्रोथर्मल सल्फाइड भंडार (जहां गर्म पानी खनिजों के साथ बाहर आता है) सोने से भरपूर क्यों होते हैं।
एक अंतहीन खोज
यह खोज हमें एक बार फिर याद दिलाती है कि प्रकृति सबसे बड़ी कीमियागर है। पाताल की गहराइयों में, जहां इंसानी पहुंच लगभग नामुमकिन है, वहां आज भी ऐसी-ऐसी प्रक्रियाएं चल रही हैं जो हमें चकित कर सकती हैं। 'सोने की रसोई' की यह खोज सिर्फ सोने के बारे में नहीं है; यह पृथ्वी के धड़कते हुए दिल को समझने की एक कोशिश है। यह विज्ञान की उस अंतहीन यात्रा का एक महत्वपूर्ण पड़ाव है, जो हमें हमारे ग्रह के अनगिनत रहस्यों के और करीब ले जाती है। भविष्य में और अधिक रिसर्च शायद इस कड़ी के बाकी हिस्सों को भी जोड़ पाएगी, लेकिन फिलहाल यह जानना ही रोमांचक है कि हमारी धरती के नीचे एक सोने की भट्टी आज भी जल रही है।

